वेद प्रकाश पांडे बने लालगंज के थाना प्रभारी
पुलिस विभाग में हुए प्रशासनिक फेरबदल के तहत वेद प्रकाश पांडे को लालगंज थाने का नया थाना प्रभारी नियुक्त किया गया है। उनकी नियुक्ति से क्षेत्र में कानून-व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाने की उम्मीद जताई जा रही है। पदभार ग्रहण करने के बाद उन्होंने कहा कि अपराध नियंत्रण, जनता की समस्याओं का त्वरित समाधान और पुलिस-जनता के बीच बेहतर समन्वय उनकी प्राथमिकता होगी। उन्होंने क्षेत्रवासियों से सहयोग की अपील करते हुए भरोसा दिलाया कि सभी शिकायतों पर निष्पक्ष और प्रभावी कार्रवाई की जाएगी। स्थानीय लोगों ने उनकी नियुक्ति का स्वागत किया है
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थाना लालगंज के प्रभारी बने वेद प्रकाश पांडेय
डामड गंज
कानून व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त रखने के लिए जनपद के पुलिस विभाग में कई फेरबदल किए गए प्राप्त जानकारी के अनुसार
पुलिस विभाग में हुए प्रशासनिक फेरबदल के तहत वेद प्रकाश पांडे को लालगंज थाने का नया थाना प्रभारी नियुक्त किया गया है। उनकी नियुक्ति से क्षेत्र में कानून-व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाने की उम्मीद जताई जा रही है। पदभार ग्रहण करने के बाद उन्होंने कहा कि अपराध नियंत्रण, जनता की समस्याओं का त्वरित समाधान और पुलिस-जनता के बीच बेहतर समन्वय उनकी प्राथमिकता होगी। उन्होंने क्षेत्रवासियों से सहयोग की अपील करते हुए भरोसा दिलाया कि सभी शिकायतों पर निष्पक्ष और प्रभावी कार्रवाई की जाएगी। स्थानीय लोगों ने उनकी नियुक्ति का स्वागत किया है
.................. भारत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी चर्चा कम होती है, लेकिन उनके फैसलों ने देश की तकदीर बदल दी। आज जब हम स्वतंत्र भारत की कहानी पढ़ते हैं, तो अक्सर बड़े राष्ट्रीय नेताओं का जिक्र होता है। लेकिन उत्तर-पूर्व भारत के एक ऐसे नेता भी थे, जिन्होंने अकेले खड़े होकर इतिहास की दिशा बदल दी। उनका नाम था गोपीनाथ बोरदोलोई। यह वही व्यक्ति थे, जिनकी दूरदर्शिता ने असम को पूर्वी पाकिस्तान में शामिल होने से बचा लिया। अगर उस समय उन्होंने विरोध न किया होता, तो शायद आज भारत का नक्शा कुछ और होता। यही कारण है कि उन्हें केवल असम का पहला मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि उस राज्य का रक्षक भी कहा जाता है। OLDISGOLDFILMS की इस विशेष प्रस्तुति में जानते हैं उस व्यक्ति की कहानी, जिसकी एक जिद ने पूरे प्रदेश का भविष्य सुरक्षित कर दिया। बचपन में मां का साया छूटा, लेकिन हौसला नहीं टूटा 6 जून 1890 को असम के राहा गांव में जन्मे गोपीनाथ बोरदोलोई का जीवन शुरू से आसान नहीं था। उनके पिता बुद्धेश्वर बोरदोलोई और माता प्राणेश्वरी बोरदोलोई थे। जब वह केवल 12 वर्ष के थे, तब उनकी मां का निधन हो गया। इतनी कम उम्र में मां का साथ छूटना किसी भी बच्चे के लिए बड़ा आघात होता है। लेकिन गोपीनाथ ने परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित किया और लगातार आगे बढ़ते रहे। कॉटन कॉलेज से शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने कोलकाता के प्रसिद्ध स्कॉटिश चर्च कॉलेज में प्रवेश लिया। वहां से स्नातक और फिर परास्नातक की डिग्री प्राप्त की। बाद में कानून की पढ़ाई पूरी कर गुवाहाटी लौटे और वकालत शुरू की। हालांकि उनके मन में केवल पेशा नहीं, बल्कि समाज की सेवा का सपना पल रहा था। अदालत से आंदोलन तक का सफर 1917 में वकालत शुरू करने वाले गोपीनाथ बोरदोलोई का जीवन जल्द ही राजनीति की ओर मुड़ गया। 1921 में असम कांग्रेस के गठन के साथ उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने वकालत छोड़कर आंदोलन में हिस्सा लिया। अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जेल उनके लिए सजा का स्थान नहीं बना। वहां उन्होंने अध्ययन किया, लेखन किया और समाज के भविष्य पर विचार किया। इसी दौर में उनके भीतर एक ऐसे नेता का निर्माण हुआ, जो सत्ता के लिए नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाला था। जब राजनीति में उभरा एक नया सितारा 1936 के प्रांतीय चुनाव असम की राजनीति में महत्वपूर्ण साबित हुए। कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन कुछ प्रशासनिक कारणों से सरकार नहीं बना सकी। ऐसे समय में गोपीनाथ बोरदोलोई विपक्ष के नेता बने। उनकी सादगी, ईमानदारी और व्यवहार ने उन्हें सभी समुदायों में लोकप्रिय बना दिया। लोग उन्हें भरोसेमंद नेता मानने लगे। राजनीतिक विरोधी भी उनके व्यक्तित्व का सम्मान करते थे। यही वजह थी कि जब मोहम्मद सादुल्ला की सरकार कमजोर हुई, तब राज्यपाल ने गोपीनाथ बोरदोलोई को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया। 21 सितंबर 1938 को उन्होंने असम के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि यह व्यक्ति कुछ वर्षों बाद असम के भविष्य का सबसे बड़ा रक्षक बनेगा। वह योजना जिसने असम का भविष्य बदल सकता था 1946 में ब्रिटिश सरकार ने भारत की स्वतंत्रता का रास्ता तय करने के लिए कैबिनेट मिशन भेजा। इस मिशन ने भारत के प्रांतों को अलग-अलग समूहों में बांटने का प्रस्ताव रखा। असम को बंगाल के साथ ग्रुप सी में रखा गया। पहली नजर में यह एक प्रशासनिक व्यवस्था लगती थी। लेकिन गोपीनाथ बोरदोलोई ने इसके पीछे छिपे खतरे को तुरंत पहचान लिया। उन्हें समझ आ गया कि बंगाल की बड़ी आबादी और राजनीतिक प्रभाव के सामने असम की आवाज कमजोर पड़ सकती है। यदि ऐसा होता, तो भविष्य में असम की दिशा बदल सकती थी। कई इतिहासकार मानते हैं कि इससे असम के पूर्वी पाकिस्तान में जाने की संभावना बढ़ सकती थी। यही वह क्षण था, जब बोरदोलोई ने इतिहास का सबसे बड़ा संघर्ष शुरू किया। गांधी से मुलाकात और निर्णायक लड़ाई गोपीनाथ बोरदोलोई ने इस मुद्दे पर महात्मा गांधी से सलाह मांगी। गांधी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि असम को अपनी पहचान बचाने के लिए इस योजना का विरोध करना चाहिए। इसके बाद बोरदोलोई ने असम कांग्रेस और अपने सहयोगियों को एकजुट किया। उन्होंने लोगों को समझाया कि यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं है। यह असम की भाषा, संस्कृति और भविष्य का प्रश्न है। लगातार बैठकों, बहसों और जनसमर्थन के माध्यम से उन्होंने विरोध की मजबूत दीवार खड़ी कर दी। आखिरकार असम ने इस योजना को स्वीकार नहीं किया। यह निर्णय बाद में असम के भारत में सुरक्षित बने रहने का सबसे महत्वपूर्ण कारण माना गया। एक नेता जिसने अकेले खड़े होकर इतिहास बदल दिया राजनीति में अक्सर बहुमत की ताकत काम करती है। लेकिन कुछ अवसर ऐसे आते हैं, जब एक व्यक्ति का साहस लाखों लोगों का भविष्य तय करता है। गोपीनाथ बोरदोलोई ने वही किया। उन्होंने अपने प्रतिनिधियों को विश्वास दिलाया कि असम को अपनी अलग पहचान बनाए रखनी चाहिए। यह फैसला आसान नहीं था। उनके सामने राजनीतिक दबाव भी थे और अनिश्चितता भी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उनकी जिद व्यक्तिगत नहीं थी। वह असम के लोगों के अधिकारों के लिए थी। यही कारण है कि आज भी उन्हें असम का रक्षक कहा जाता है। युद्ध, शरणार्थी और मानवता की मिसाल द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब जापानी सेना बर्मा तक पहुंच गई, तब असम में शरणार्थियों की बड़ी समस्या पैदा हुई। हजारों लोग सुरक्षा की तलाश में यहां पहुंचे। ऐसे कठिन समय में गोपीनाथ बोरदोलोई ने पीस ब्रिगेड का गठन किया। यह संगठन शरणार्थियों की मदद करता था और सामाजिक तनाव को कम करने का प्रयास करता था। बिना हथियार के लोगों की रक्षा करना आसान नहीं था। लेकिन बोरदोलोई ने साबित किया कि नेतृत्व केवल आदेश देने का नाम नहीं है। सच्चा नेतृत्व संकट के समय लोगों के साथ खड़े होने का नाम है। स्वतंत्र भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान 1947 में देश स्वतंत्र हुआ और गोपीनाथ बोरदोलोई फिर मुख्यमंत्री बने। अब उनके सामने नई चुनौतियां थीं। विभाजन के कारण बड़ी संख्या में शरणार्थी असम पहुंचे। उन्होंने उनके पुनर्वास का काम किया। साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए। गौहाटी विश्वविद्यालय, असम मेडिकल कॉलेज और असम वेटरिनरी कॉलेज जैसी संस्थाओं की स्थापना में उनका बड़ा योगदान रहा। भूमि सुधार लागू किए गए और स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा की गई। उन्होंने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि विकास का लाभ आम जनता तक पहुंचे। मुख्यमंत्री होते हुए भी रहे साधारण इंसान सत्ता अक्सर लोगों को बदल देती है। लेकिन गोपीनाथ बोरदोलोई अलग थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने सादा जीवन जिया। उनके लिए पद सम्मान का नहीं, जिम्मेदारी का प्रतीक था। उन्होंने कभी व्यक्तिगत लाभ को प्राथमिकता नहीं दी। जेल में रहते हुए उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं। इनमें "अनासक्तियोग", "श्रीरामचंद्र", "हजरत मोहम्मद" और "बुद्धदेव" जैसी रचनाएं शामिल हैं। यह उनकी आध्यात्मिक सोच और व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाती हैं। वह हर धर्म और समुदाय का सम्मान करते थे। क्यों कहा गया उन्हें "लोकप्रिय"? असम के तत्कालीन राज्यपाल जयराम दास दौलतराम ने उन्हें "लोकप्रिय" की उपाधि दी थी। इसका अर्थ था "सबके प्रिय"। यह सम्मान किसी सरकारी आदेश से नहीं मिला था। यह उनके व्यक्तित्व की पहचान बन गया था। वह जनता के बीच रहते थे। उनकी समस्याएं सुनते थे। उनके निर्णयों में ईमानदारी दिखाई देती थी। इसलिए लोग उन्हें केवल मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि अपना प्रतिनिधि मानते थे। भारत रत्न से सम्मानित हुआ एक अनसुना नायक 5 अगस्त 1950 को गोपीनाथ बोरदोलोई का निधन हो गया। लेकिन उनके कार्यों की गूंज कभी समाप्त नहीं हुई। दशकों बाद देश ने उनके योगदान को औपचारिक सम्मान दिया। 1999 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 2002 में संसद भवन में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं था। यह उस सोच का सम्मान था, जिसने राष्ट्रहित को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर रखा। निष्कर्ष: एक जिद जिसने इतिहास बदल दिया आज जब हम भारत के नक्शे को देखते हैं, तो शायद हमें यह एहसास नहीं होता कि इसके पीछे कितने लोगों के संघर्ष छिपे हैं। गोपीनाथ बोरदोलोई उन्हीं महान व्यक्तित्वों में से एक थे। उन्होंने साबित किया कि दूरदर्शिता और साहस मिलकर इतिहास बदल सकते हैं। यदि उन्होंने 1946 में विरोध न किया होता, तो असम का भविष्य अलग हो सकता था। इसलिए उनकी कहानी केवल असम की नहीं, बल्कि पूरे भारत की कहानी है। OLDISGOLDFILMS के लिए यह प्रेरणा का विषय है कि एक अकेला व्यक्ति भी राष्ट्र की दिशा बदल सकता है। उनकी विरासत आज भी हमें सिखाती है कि सही समय पर लिया गया साहसी निर्णय आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित कर सकता है।
..................... आकाशीय बिजली गिरने से एक की दर्दनाक मौत चार गंभीर रूप से घायल डामड गंज प्राकृतिक प्रकोप से अचानक गरज चमक के साथ बारिश हुई और आकाशीय बिजली गीरने से एक युवक की दर्दनाक मौत हो गई और चार गंभीर रूप से घायल हो गये प्राप्त जानकारी के अनुसार थाना हलिया क्षेत्र के गांव परसिया और मुड पेली गांव में अचानक गरज चमक के साथ बारिश के दौरान आकाशीय बिजली गिरी गांव परसिया निवासी राजाराम उम्र लगभग 25 वर्ष अपने साथी अजय उम्र लगभग 22 वर्ष के साथ मोटरसाइकिल से अदवा बैराज घूमने गया था वापसी में बारिश होने लगी वह महुआ के पेड़ के नीचे खड़ा हो गया उसी समय आकाशीय बिजली महुआ के पेड़ पर गिरी और राजाराम का मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गया वह अपने माता-पिता का इकलौता संतान था और अजय गंभीर रूप से घायल हो गया इसी तरह मुड पेली गांव में कच्चे मकान के बरामदे में 55 वर्षीय रामादेवी अपनी दो बहुएं रीता और रीना के साथ बैठी थी वहां पर भी आकाशीय बिजली गिरी जिसमें तीनों घायल हो गए घायलों को हलिया स्थित स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया गया जहां उनका इलाज हो रहा है मृतक के शव को पुलिस में बरामद कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया इस दुर्घटना की सूचना पाकर उप जिलाधिकारी अजीत कुमार घटनास्थल पर पहुंचे घायलों का हाल-चाल लिया और उचित सहायता का आश्वासन दिया
................. ब्रेकिंग न्यूज मिर्जापुर अदलहाट के जगन्नाथपुर में पुल के नीचे मिला वृद्ध का शव 24 घंटे से लापता थे वृद्ध, तलाश के बाद मिला शव भट्ठे पर मजदूरी कर परिवार पालने वाले वृद्ध मजदूर की दर्दनाक मौत परिवार में मचा कोहराम, गांव में पसरा मातम पुलिस ने शव कब्जे में लेकर शुरू की जांच-पड़ताल ..................... अयोध्या के श्रीरामजन्मभूमि मंदिर के चढ़ावे की रकम चोरी मामले में ट्रस्ट FIR दर्ज कराने के लिए तैयार नही है. ट्रस्ट की ओर से एक इंटरनल कमेटी बनाई गयी है जो चोरी कांड की जांच करेगी. विपक्षी दलों के नेताओं पर मामूली मामलों में केस दर्ज कराने और ED-CBI का इस्तैमाल करने वाली BJP राममंदिर चोरी कांड में आरोपियों पर कार्रवाई नही करना चाहती. आखिर क्यों? क्या ट्रस्ट से जुड़े लोग ही इस वारदात में शामिल है. 4 साल से हो रही चोरी का यह मामला आखिर कितने करोड़ का है. ठीक इसी तरह मंदिर के लिए खरीदी गयी जमीन को लेकर भी सवाल खड़े हुए थे. जमीन मंदिर के लिए खरीदी गयी लेकिन उस खरीद में भी आरोप लगे कि जमीन का वास्तविक मूल्य और खरीद मूल्य के बीच करोड़ों का अंतर है यानी कोई ब्रोकर था जो करोड़ों रूपये लील गया. उस मामले में भी सिर्फ आंतरिक जांच कराने का दावा किया गया था. मगर हुआ क्या- शून्य! अखिलेश यादव ने जब इस मामले में सबसे पहले चोरी कांड की आवाज उठाई तो उन्हें टारगेट किया गया. मगर दैनिक जागरण जैसे बीजेपी के मुखपृष्ठ अखबार ने इस मामले में पूरे चोरीकांड की तहें उधेड़कर रख दी है. हर रोज दैनिक जागरण नये खुलासे कर रहा है. सवाल यह भी है कि देश के अन्य बड़े मंदिरों की तरह इस मंदिर में चढ़ावे की रकम पर निगरानी के लिए कोई व्यवस्था क्यों नही की गयी. क्यों पारदर्शी व्यवस्था के नाम पर पर्दा डाला जा रहा है. वैसे लाइट मूड में शंकराचार्य श्रीअविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज ने चंपत शब्द का विश्लेषण करके बताया था कि जहां इस शब्द को धारण करने वाला स्वंय विराजमान हो, वहां पारदर्शिता और ईमानदारी जैसे शब्द महत्वहीन है.
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