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मिर्ज़ापुर न्यूज़ एजेंसी

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मिर्जापुर। मां विंध्यवासिनी देवी दरबार में मंगलवार के दोपहर 2:00 बजे पहुंचे केंद्रीय मंत्री एसपी सिंह बघेल ने किया मां का दर्शन पूजन। मिर्जापुर न्यूज एजेंसी के साथ वार्ता करते हुए बताया कि केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार के सहयोग से करोड़ों रुपए की लागत से भक्तों की सेवा में भव्य दिव्य कारिडोर बनाए गए हैं। उन्होंने कहा कि बिहार राज्य में चुनाव के लेकर उन्होंने कहा बताया कि प्रदेश स्तर से लेकर बुथ स्तर तक कार्यकर्ताओं का जोश के साथ एनडीए की सरकार पूर्ण रूप से बिहार राज्य में सरकार बनाएगी। 

  मनीष रावत की रिपोर्ट

.................... पड़री थाने का रहस्य: ऋषभ दुबे की मां की गुहार, न्याय की आस में बेटे की बेबसीपड़री, 28 अक्टूबर 2025: उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के पड़री थाने से एक ऐसी सनसनीखेज कहानी सामने आ रही है, जो न केवल स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रही है, बल्कि न्याय व्यवस्था की कमजोर कड़ियों को भी उजागर कर रही है। गांव भेवर करमनपुर की निवासिनी एक मां का दर्द, जो अपने इकलौते बेटे ऋषभ दुबे की रिहाई के लिए दर-दर भटक रही है। मां का आरोप है कि पड़री थाने में उनके बेटे को बिना किसी ठोस कारण के आज भी हिरासत में रखा गया है, जबकि मामला महज पड़ोसी ब्रह्मचारी दुबे के चोरी के झूठे आरोप पर टिका हुआ है। थाने के अध्यक्ष महोदय से संपर्क करने की हर कोशिश नाकाम हो रही है—फोन की घंटी बजती है, लेकिन कोई जवाब नहीं। यह घटना न केवल एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि ग्रामीण इलाकों में पुलिस की मनमानी का एक जीता-जागता उदाहरण बन चुकी है।मामला: पड़ोसी की रंजिश से शुरू हुई कहानीजानकारी के अनुसार, ऋषभ दुबे (उम्र लगभग 25 वर्ष) भेवर करमनपुर गांव का रहने वाला एक साधारण युवक है। वह अपने परिवार के साथ खेती-बाड़ी और छोटे-मोटे कामों से गुजारा करता है। कुछ महीनों पहले, पड़ोसी ब्रह्मचारी दुबे ने ऋषभ पर चोरी का आरोप लगाते हुए पड़री थाने में शिकायत दर्ज कराई। मां का कहना है कि यह आरोप पूरी तरह झूठा और रंजिश से प्रेरित है। "हमारा परिवार कभी किसी से दुश्मनी नहीं रखता। ब्रह्मचारी दुबे का हमारे साथ पुराना विवाद है, जो जमीन और पानी के मुद्दे पर था। उन्होंने बदला लेने के लिए मेरे बेटे को फंसाया," मां ने आंसू भरी आंखों से बताया।शिकायत के बाद ऋषभ को गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन अब तक कोई औपचारिक चार्जशीट दाखिल नहीं हुई है, न ही कोई सुनवाई हुई है। मां के अनुसार, थाने में बेटे को "बिठा" रखा गया है—जैसे कोई सजा काट रहा हो। "मेरा बेटा निर्दोष है। थाने वाले कहते हैं कि कोई बड़ी घटना नहीं हुई, लेकिन फिर भी उसे छोड़ते क्यों नहीं? क्या अपराधी अमीरों के लिए आरक्षित है और गरीबों के लिए जेल?" मां का यह सवाल हर उस परिवार को झकझोर देगा, जो कानून के नाम पर न्याय की आस लगाए बैठा है।थाना अध्यक्ष का 'अदृश्य' रवैया: फोन पर सन्नाटा, न्याय पर सवालमां की सबसे बड़ी शिकायत थाना अध्यक्ष महोदय के रवैये से है। "पहले तो उन्होंने फोन पर बात की और कहा कि कोई घटना नहीं है, सब ठीक हो जाएगा। लेकिन आज दिनांक (28 अक्टूबर 2025) को फोन लगाने पर घंटी बज रही है, कोई उठा ही नहीं रहा। क्या अधिकारी इतने व्यस्त हैं कि एक मां की पुकार सुनने का वक्त भी नहीं?" मां ने बताया कि वह कई बार थाने पहुंचीं, लेकिन हर बार टालमटोल का जवाब मिला। न तो कोई वकील से मिलने दिया जाता है, न ही कोई मेडिकल जांच। यह व्यवहार न केवल पुलिस की संवेदनशीलता पर सवाल उठाता है, बल्कि मानवाधिकारों का भी उल्लंघन करता प्रतीत होता है।स्थानीय लोगों का कहना है कि पड़री थाने में ऐसे कई मामले लंबित हैं, जहां गरीब और असहाय लोग फंस जाते हैं। एक ग्रामीण ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "यहां तो थाना ही अदालत बन गया है। बिना सबूत के हिरासत, और संपर्क न होने पर तो जैसे मौत की सजा। ऊपर से पड़ोसी का झूठा केस—ऐसे में निर्दोष कैसे साबित हो?" यह घटना ग्रामीण भारत की उस कड़वी हकीकत को बयां करती है, जहां पुलिस स्टेशन न्याय का अंतिम द्वार नहीं, बल्कि भय का प्रतीक बन चुका है।सवालों का पुलिंदा: क्यों हो रही है यह मनमानी?झूठे आरोपों का सहारा: ब्रह्मचारी दुबे का चोरी का आरोप कितना मजबूत है? क्या कोई ठोस सबूत पेश किया गया? अगर नहीं, तो ऋषभ को हिरासत में क्यों रखा गया? प्रशासन की चुप्पी: थाना अध्यक्ष का फोन न उठाना क्या लापरवाही है या जानबूझकर टालना? उच्च अधिकारियों को इसकी जानकारी क्यों नहीं? न्याय की देरी: भारतीय कानून कहता है कि गिरफ्तारी के 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी होनी चाहिए। यहां तो महीनों बीत चुके हैं—क्या यह संवैधानिक उल्लंघन नहीं? मां का दर्द: एक बुजुर्ग महिला, जो गांव से थाने पैदल आती है, उसके आंसू कौन पोंछेगा? क्या पुलिस को मां की पुकार सुनाई नहीं देती? यह मामला केवल ऋषभ दुबे का नहीं, बल्कि हर उस निर्दोष का है जो सिस्टम की चक्की में पिस रहा है। पड़री थाने की यह कार्रवाई न केवल कानूनी प्रक्रिया का मजाक उड़ा रही है, बल्कि ग्रामीणों के विश्वास को भी चूर-चूर कर रही है।अपील: न्याय की घंटी बजाओऋषभ की मां ने सभी से अपील की है कि इस मामले में हस्तक्षेप करें। "मेरा बेटा मेरा सहारा है। अगर कुछ हुआ तो हमारा परिवार बर्बाद हो जाएगा। कृपया थाना अध्यक्ष से बात करवाएं, या उच्च अधिकारियों को सूचित करें।" स्थानीय एसपी कार्यालय और मानवाधिकार आयोग से भी उम्मीद है कि यह मामला संज्ञान में आए। अगर समय रहते न्याय नहीं मिला, तो यह एक बड़ा आंदोलन बन सकता है—क्योंकि एक मां का दर्द कभी व्यर्थ नहीं जाता।पड़री थाना प्रभारी द्वारा ऐसी मनमानी क्यों की जा रही है, इसका जवाब तो अधिकारी ही दे सकते हैं। लेकिन तब तक, ऋषभ दुबे हिरासत की चारदीवारी में सिसकते रहेंगे, और उनकी मां की आंखें नम रहेंगी। क्या यह वह भारत है, जहां 'सबका साथ, सबका विकास' का नारा गूंजता है? समय है कि प्रशासन जागे, वरना न्याय की दीवारें और कमजोर हो जाएंगी।

...................... मिर्जापुरःस्टेशन रोड निवासी पत्रकार रविंद्र जायसवाल पड़री थाना क्षेत्र में एक सड़क दुर्घटना में घायल हो गए हैं ऐसी जो सूचना है।

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